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हरे कृष्ण इस्कॉन® कुलाई, मैंगलोर, की वेबसाइट पर *रजिस्टर करें* अपनी भाषा में ऑनलाइन माध्यम से गुरु परंपरा से मुफ़्त गीता सीखें 18 दिन मे 👇
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हरे कृष्ण इस्कॉन® कुलाई, मैंगलोर, की वेबसाइट पर *रजिस्टर करें* अपनी भाषा में ऑनलाइन माध्यम से गुरु परंपरा से मुफ़्त गीता सीखें 18 दिन मे 👇

29 Jun 2026 1 month ago Jeetendra Sharan


हरिनाम इतना शक्तिशाली है कि अपराध करते हुए जप किया जायेगा तो भी व्यक्ति धीरे-धीरे शुद्ध हो जायेगा। इसलिए हमें जप नहीं छोड़ना है। हर परिस्थिति में हमें हरे कृष्ण का जप करना है।

(श्रील प्रभुपाद ,डेनवर, 28 जून 1975 )
💫

ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद और हमारी गुरुपरंपरा की जय हो।"संदर्भ: भगवद् गीता 4.1- 4.3" क्या आपको पता है अर्जुन से भी पहले भगवत गीता का ज्ञान करोडो वर्ष पहले सूर्य देव को दिया गया था?

रथ सप्तमी जिसे सूर्य देव के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है ,उसी रथ सप्तमी के दिन से मैंने भागवत गीता गुरु परम्परा से (Level -1 ) ,इस्कॉन ®,कुलाई, मंगलोर द्वारा पढ़ना शुरू किया था।

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भगवद गीता यथारूप - गुरु-परम्परा 👉

Bhagavad Gita 4.1 👇

परम भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-मैने इस शाश्वत ज्ञानयोग का उपदेश सूर्यदेव, विवस्वान् को दिया और विवस्वान् ने मनु और फिर इसके बाद मनु ने इसका उपदेश इक्ष्वाकु को दिया।

Bhagavad Gita 4.2 👇

हे शत्रुओं के दमन कर्ता! इस प्रकार राजर्षियों ने सतत गुरु परम्परा पद्धति द्वारा ज्ञान योग की विद्या प्राप्त की किन्तु अनन्त युगों के साथ यह विज्ञान संसार से लुप्त हो गया प्रतीत होता है।

Bhagavad Gita 4.3 👇

उसी प्राचीन गूढ़ योगज्ञान को आज मैं तुम्हारे सम्मुख प्रकट कर रहा हूँ क्योंकि तुम मेरे मित्र एवं मेरे भक्त हो इसलिए तुम इस दिव्य ज्ञान को समझ सकते हो।

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एवं परम्पराप्राप्तम् इमं राजर्षयो विदुः (भगवद्गीता ४.२) | यह भगवद्गीता यथारूप इस गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त हुई है –
१. श्रीकृष्ण ,२. ब्रह्मा ,३. नारद , ४. व्यास ५. मध्व,६. पद्मनाभ ,७. नृहरि ,८. माधव
९. अक्षोभ्य,१०.जयतीर्थ , ११.ज्ञानसिन्धु , १२.दयानिधि ,१३.विद्यानिधि , १४.राजेन्द्र
१५.जयधर्म ,१६.पुरुषोत्तम , १७.ब्रह्मण्यतीर्थ १८. व्यासतीर्थ,१९.लक्ष्मीपति,२०.माधवेन्द्रपुरी
२१.ईश्र्वरपुरी (नित्यानन्द, अद्वैत),२२.श्रीचैतन्य महाप्रभु
२३.रूप(स्वरूप, सनातन),२४.रघुनाथ, जीव
२५.कृष्णदास,२६.नरोत्तम,२७.विश्र्वनाथ, २८.(बलदेव) जगन्नाथ,२९.भक्तिविनोद,३०.गौरकिशोर
३१.भक्तिसिद्धान्त सरस्वती,३२.ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद और अब उनके शिष्यों के माध्यम से हम तक।

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लाइव यूट्यूब लिंक:*
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इस्कॉन® कुलाई, मैंगलोर,से भागवतम की कक्षा

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🔗 Zoom Link : https://us02web.zoom.us/j/83155853450?pwd=pmWl5YVZyv5hRf17QggM5RgQn8POHD.1

Meeting ID:  83155853450
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भगवद् गीता (Hindi ) Online Class यूट्यूब रिकॉर्डिंग लिंक 👇

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Bhagavad Gita Verse Of the Day:Chapter 17 Verse 18👇

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् |
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् || १८ ||

सत्-कार - आदर; मान - सम्मान; पूजा -तथा पूजा; अर्थम् - के लिए; तपः - तपस्या; दम्भेन - घमंड से; च - भी; एव - निश्चय ही; यत् - जो; क्रियते - किया जाता है; तत् - वह; इह - इस संसार में; प्रोक्तम् - कहा जाता है; राजसम् - रजो गुणी; चलम् - चलायमान; अध्रुवम् - क्षणिक ।

Translation👇

जो तपस्या दंभपूर्वक तथा सम्मान, सत्कार एवं पूजा कराने के लिए सम्पन्न की जाती है, वह राजसी (रजोगुणी) कहलाती है । यह न तो स्थायी होती है न शाश्र्वत ।

Commentary👇

कभी-कभी तपस्या इसलिए की जाती है कि लोग आकर्षित हों तथ उनसे सत्कार, सम्मान तथा पूजा मिल सके । रजोगुणी लोग अपने अधीनस्थों से पूजा करवाते हैं और उनसे चरण धुलवाकर धन चढ़वाते हैं । तपस्या करने के बहाने ऐसे कृत्रिम आयोजन राजसी माने जाते हैं । इनके फल क्षणिक होते हैं, वे कुछ समय तक रहते हैं । वे कभी स्थायी नहीं होते ।



“We urge all parties to commit to genuine peace talks and halt all military operations that endanger civilian lives.”
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